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पहले करोड़ों फूंके… अब आरी चलाई!” कटघोरा वन विभाग का ‘हरित खेल’! जिस रतनजोत पर मिला पुरस्कार, आज उसी को काटकर फिर खर्च किए जा रहे करोड़ों रुपये

कोरबा/कटघोरा। वन विभाग की योजनाएं आखिर जनता के हित में बनती हैं या सिर्फ सरकारी बजट खर्च करने के लिए? कटघोरा वनमंडल से सामने आया मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस रतनजोत वृक्षारोपण को कभी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना बताकर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, आज उसी पर वन विभाग की आरी चल रही है। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर यह हरित विकास है या सरकारी धन की हरित बर्बादी?

करोड़ों रुपये खर्च… अब उसी पर चली आरी

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जानकारी के अनुसार वनमंडल कटघोरा के वनपरिक्षेत्र पसान, सर्किल सेमरा अंतर्गत सैला-कुटेलामुड़ा आरक्षित वन क्षेत्र में वर्ष 2008-09 के दौरान लगभग 100 हेक्टेयर क्षेत्र में रतनजोत का वृक्षारोपण किया गया था। उस समय इसे जैव ईंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि बताया गया था। लेकिन अब वर्ष 2025-26 में उसी वृक्षारोपण को काटकर नए पौधे लगाए जा रहे हैं। यानी पहले करोड़ों रुपये खर्च कर पौधे लगाओ… फिर उन्हीं पौधों को काटकर दोबारा करोड़ों रुपये खर्च करो।

जिस काम पर मिला पुरस्कार… वही आज क्यों बना बोझ?

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इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसी वृक्षारोपण को उत्कृष्ट कार्य मानते हुए तत्कालीन कोरबा कलेक्टर अशोक अग्रवाल ने स्वतंत्रता दिवस समारोह में वनपाल कोमल शर्मा को सम्मानित किया था। उस समय तत्कालीन वनमंडलाधिकारी भी कार्यक्रम में मौजूद थे। अब सवाल यह है कि यदि वृक्षारोपण इतना उत्कृष्ट था कि उस पर पुरस्कार दिया गया, तो आज उसे पूरी तरह खत्म करने की नौबत क्यों आ गई? और यदि वह सफल नहीं था, तो उस समय जनता और शासन को किस आधार पर सफलता की कहानी सुनाई गई?

यह पहली बार नहीं… पहले भी दोहराया गया खेल

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सूत्र बताते हैं कि वर्ष 2007-08 में सेमरा बीट में लगाए गए रतनजोत वृक्षारोपण को भी वर्ष 2022-23 में काटकर नया वृक्षारोपण कर दिया गया था। यानी यह कोई पहली घटना नहीं है। सवाल यह है कि क्या हर कुछ वर्षों में पुराने पौधे हटाकर नए पौधे लगाने का यही वन विभाग का मॉडल है?

किसने दी करोड़ों की परिसंपत्ति काटने की अनुमति?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुराने वृक्षारोपण को हटाने की अनुमति किस सक्षम प्राधिकारी ने दी? क्या शासन से विधिवत स्वीकृति ली गई थी? क्या कोई तकनीकी रिपोर्ट, सर्वे या वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया था, जिसमें यह साबित हो कि पुराने पौधों को हटाना आवश्यक था?

यदि नहीं, तो करोड़ों रुपये की सरकारी परिसंपत्ति को हटाने का फैसला किस आधार पर लिया गया?

रतनजोत योजना सफल थी या पूरी तरह विफल?

यदि करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए गए पौधों को कुछ वर्षों बाद ही काटना पड़ रहा है, तो इसका सीधा अर्थ है कि कहीं न कहीं योजना की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न है।

क्या रतनजोत परियोजना वास्तव में विफल रही? यदि हां, तो इसकी जवाबदेही किसकी तय हुई? क्या किसी अधिकारी, किसी एजेंसी या किसी नीति निर्माता पर कोई कार्रवाई हुई? या फिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी पूरा मामला फाइलों में ही दफन हो गया?

जनता जानना चाहती है जवाब

यह मामला केवल वृक्ष काटने का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी धन, योजना निर्माण, सरकारी जवाबदेही और वन विभाग की कार्यप्रणाली से जुड़ा हुआ है।

यदि जांच में यह सामने आता है कि बिना सक्षम अनुमति के पुराने वृक्षारोपण को हटाया गया या बिना मूल्यांकन के करोड़ों रुपये की योजना को खत्म कर दिया गया, तो यह मामला केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का भी विषय बन सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या वन विभाग जनता को बताएगा कि रतनजोत पर खर्च हुए करोड़ों रुपये का हिसाब क्या है, या फिर यह भी सरकारी योजनाओं की उस लंबी सूची में शामिल हो जाएगा, जहां पैसा खर्च होता है लेकिन जवाबदेही कभी तय नहीं होती?

Ritesh GUPTA

Ritesh Gupta Editor-in-Chief | Lallanguru News Ritesh Gupta is the Editor-in-Chief of Lallanguru News, dedicated to delivering accurate, unbiased, and impactful journalism. With a strong commitment to public interest reporting, he focuses on investigative journalism, governance, legal affairs, public accountability, and issues affecting local communities. His mission is to uphold the highest standards of ethical journalism by presenting factual, credible, and timely news while giving a voice to people and promoting transparency in public life.

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